मेरा गुरूर

मैं अंतर्मुखी हूं,
इसीलिए कभी – कभी कुछ दुखी हूं,
और कभी – कभी कुछ सुखी हूं ।
बोलने से पहले तौलती हूं,
यदा – कदा मन का कह नहीं पाती,
तो थोड़ी खौलती हूं ।
कोई कहे ख़ामोश मुझे,
कोई कहे मगरूर हूं..
मगरुर तो नहीं हूं, मगर मैं मेरा ही गुरूर हूं।
………..✍️ गीता..

Comments

18 responses to “मेरा गुरूर”

  1. बहुत सुंदर

  2. Geeta kumari

    बहुत बहुत शुक्रिया आपका चंद्रा जी 🙏

  3. Suman Kumari

    बहुत सुन्दर गीताजी ।
    इस गरूर की आवश्यकता हम सभी को है

    1. Geeta kumari

      जी बिल्कुल सुमन जी। सुंदर समीक्षा के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया 🙏

    1. Geeta kumari

      Thank you bhai ji🙏

  4. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर पंक्तियां

    1. Geeta kumari

      Thank you very much Pratima ji

  5. Satish Pandey

    आपकी रचना अतिउत्तम है। स्वयं पर भरोसे से परिपूर्ण है। एक सुलझा हुआ व्यक्तित्व ही इतनी शानदार रचना कर सकता है। इस प्रतिभा को अभिवादन है। आपकी काव्य सृजन क्षमता लाजवाब है।

    1. Geeta kumari

      आपकी इस प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार एवं धन्यवाद,
      आपकी समीक्षाएं मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।….धन्यवाद सर🙏

  6. Devi Kamla

    वाह वाह

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद जी 🙏

  7. Indu Pandey

    जबरदस्त लेखन waah

    1. Geeta kumari

      Aapki samiksh aur prashansa k liye bahut sara dhanyawad indu ji

  8. Seema Chaudhary

    बहुत सुंदर लेखन

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद सीमा

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