इन मैले वस्त्रों में घूमूं,
अच्छा नहीं लगता है।
मैं भी कुछ बनूं,उडूं गगन को चूमूं,
मेरा मन भी करता है।
माँ संग जाना बर्तन धोना,
अच्छा नहीं लगता है।
मैं भी कुछ पढूं-लिखूं,
मेरा मन भी करता है।
फ़िर आकर अपनी झुग्गी में,
मन्द रोशनी में बैठूं,
अच्छा नहीं लगता है।
मेरे घर भी बल्ब जलें,
पढ़कर किसी परीक्षा में बैठूं
मेरा मन भी करता है।
बहुत हो चुका घर-घर का काम,
अब मैं भी विद्यालय जाऊं,
मेरा मन भी करता है।
मैंने माँ का मैला आंचल ही देखा,
सदा मन मारते देखा,पर
अब अच्छा नहीं लगता है।
पढ़ लिखकर कुछ काबिल बन कर,
माँ को सुंदर साड़ी भेंट करूं,
मेरा मन भी करता है।
____✍️गीता
मेरा मन भी करता है
Comments
7 responses to “मेरा मन भी करता है”
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शिक्षा की ललक को दिखाती गरीब बाला की व्यथा
प्रतिदिन भेंट मेरी है इससे आंखों देखी ये कथा-
सुन्दर समीक्षा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी
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बहुत सुन्दर
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अतिसुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏
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पढ़ लिखकर कुछ काबिल बन कर,
माँ को सुंदर साड़ी भेंट करूं,
मेरा मन भी करता है।
——- कवि गीता जी की बहुत सुन्दर और लाजवाब अभिव्यक्ति-
सुंदर और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी।
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