मेरी हिंदी

दिल से दिल तक अपना रस्ता बना लेती है,
ये हिंदी ही हम सबको अपना बना लेती है।।

हो जाए गर नाराज़गी तो मस्का लगा देती है,
बातों हो बातों में साथी से रब्ता बना लेती है,

ज़मी से आसमां तलक परचम लहरा लेती है,
मंहगा जितना हो दर्द उसे ये सस्ता बना लेती है,

भारत माँ के आँचल को गुलदस्ता बना लेती है
चाहे जो हो धर्म सब पे ही कब्ज़ा बना लेती है।।

राही अंजाना

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