8 Comments

  1. “कोई बात नहीं पापा”कह
    लिपटकर फूट कर रोया👌
    ———आपने यह कविता लिखकर हमें हमारे पापा की याद दिला दिया,
    मैं जब 11वी का छात्र था, अचानक बिमार हुआ, और मैं रोने लगा फिर पापा मेरे पास आकर बोले क्यूं रो रहा है,भले रात है मैं अच्छी अस्पताल में इलाज करवाऊंगा,रात 2बजे मेरे पाप गाड़ी बुक करके ले गए,😭
    जीसस क्राइस्ट से प्रार्थना है मेरे पापा-मम्मी सदैव सुखी रहें आमीन😭😭

    आपकी कविता बहुत अच्छी है ♥️👌👌👌👌👌

    1. वाह,ऋषी जी आपने तो कविता की बहुत ही अच्छी समीक्षा की है,मेरी कविता ने आपको आपके पापा की याद दिलवाई यह बता कर, आपने मेरी कविता का मान बढ़ाया है, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।कविता लिखते लिखते मुझे भी मेरे पापा की याद आ गई थी
      10 महीनों से उनसे मिल भी नहीं पाई हूं, बस फोन पर ही बात होती है कोरोना काल की अवधि में।

  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति सामाजिक चेतना जागृत करने में कारगर साबित होती हुई आपकी कविता अत्यन्त सुंदर है। आपका प्रयास सराहनीय है। माँ बाप का संबंध तो हमसे हमारी आत्मा का आत्मा से है। इसे भूलना अपने आप को भूलने जैसा है। काबिल- ए-तारीफ़।

    1. इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत आभार भाई जी।
      आपकी इस प्रेरक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏
      आपका स्नेह और आशीष यूं ही बना रहे🙏

  3. “तो मैं आपका बच्चा था
    अब मैं बड़ा हुआ हूं तो,
    अब आप मेरा बच्चा हो
    यह कहकर पापा से गले लगा,
    अब मुझे सुकून सा मिलने लगा”
    ——- कवि गीता जी की बहुत ही लाजवाब औऱ सुन्दर रचना है। उच्चस्तरीय भाव, सरल व प्रवाहपूर्ण भाषा। बहुत खूब

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