मेरे भारत के युवक जाग

मेरे भारत के युवक जाग
आलस्य त्याग, उठ जाग जाग
तेरी मंजिल कुछ पाना है,
पाने तक चलते जाना है।
सोने को तो रात बहुत है
क्यों तू दिन में सोता है,
दिन में सब पाने को जुटते
सोकर क्यों तू खोता है।
मोबाइल से ज्ञान खोज ले
गलत राह क्यों खोज रहा
छोड़ इसे, कुछ मेहनत कर ले
इसमें आंखें क्यों फोड़ रहा।
समय पे सो जा जाग समय पर
दौड़ लगा, व्यायाम भी कर,
ठोस बना ले जिस्म स्वयं का,
सच्चाई की राह पकड़।
मेरे भारत के युवक जाग
आलस्य त्याग, उठ जाग जाग
तेरी मंजिल कुछ पाना है,
पाने तक चलते जाना है।

Comments

16 responses to “मेरे भारत के युवक जाग”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    सरल शब्दो में; प्रेरणादायक एवं युवाओं को प्रोत्साहित करने वाली सुंदर पंक्तियां

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद सर, सुन्दर समीक्षा हेतु अभिवादन

  2. बहुत बढ़िया

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

  4. Geeta kumari

    बहुत बढ़िया, प्रेरणादयक प्रस्तुति। युवाओं को जागृत करती आपकी लेखनी को सलाम।सुंदर साहित्य

    1. Satish Pandey

      आपके द्वारा की गई बेहतरीन समीक्षा से अत्यंत हर्ष हो रहा है, बहुत सारा धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद शास्त्री जी

    1. Satish Pandey

      आपको हार्दिक धन्यवाद सर जी

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

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