मेरे रोम -रोम में बसा तेरा नाम।

मेरे रोम- रोम में बसे तेरा नाम ,
कण कण में तू रग- रग में तू,
अद्वितीय तू, अखंड तू,
क्षण- क्षण में रमा है तू,
सुक्ष्म रूप भी है तेरा ,
और विशालकाय पर्वत सा भी है तू,
तू मिलता है कुछ-कुछ रहीम सा भी,
और मिलता है कुछ-कुछ शिव जैसा भी,
रहता है तू जब मेरे हृदय में,
तो क्यों ढूंढो मैं तुम्हें यहां वहां,
हे ईश्वर तू प्रेम में बसा है,
और रमता है दया में,
किसी प्यासे की आस में है तू,
किसी के सुख का एहसास है तू,
मैं मूर्ख इंसान प्रभू  !
जो देख ना पाऊं मूर्त्तियों में तुम्हें,
थोड़ा सा हूं अनजान प्रभू!
जो मानता नहीं तुम्हें तन की शुद्धि में,
पर इतना सा है ज्ञान प्रभु!
जो ढूंढ रहा हूं तुमको,
अपनें मन की झुग्गी में,
पर मन मेरा बड़ा चंचल ठेहरा,
करता बड़ी सी गलती है,
पाखंडों में लिन दुनिया,
भ्रमित मन को करती है,
मैं गलतियों का धाम प्रभू!
पर कृपया तुम्हीं को करनी है।

Comments

7 responses to “मेरे रोम -रोम में बसा तेरा नाम।”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    ,🙏

  2. Geeta kumari

    सुंदर रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद जी

  3. सूक्ष्म
    योजक चिह्न का यथोचित प्रयोग

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏🙏

      1. Abhishek kumar

        👍

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