मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा

मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा
क्या यह ऐसे ही उजड़ा रहे जाएगा
दो चार दिन को तो आते है सब
पर जिसका इंतजार वह कब आयेगा

इंतजार करते हुए थक सी गई है आंखियां
उनके इंतजार मे सूनी पड़ी है गलियां
बरसो हो गए पथ निहारते हुए
क्या इस पथ अब कोई नहीं आयेगा
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा

थक सी गई आँखे आसमान की तपिश से
ठहर गई ज़िन्दगी उनके प्यार की बंदिश से
अब तो प्यास बुझा दे ऐ मेरी ज़िन्दगी
ना जाने वह कब प्यार बरसाएगा
मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा

मेरे वीराने जहाँ को भी कोई बसाएगा
क्या यह ऐसे ही उजड़ा रहे जाएगा
दो चार दिन को तो आते है सब
पर जिसका इंतजार वह कब आयेगा
पंकज प्रिंस

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