मेहनत के रंग

वो बूढ़ी थी, गरीब थी
भीख नहीं मांगी थी उसने,
पैन बेच रही थी राहों में
मेहनत का खाने की ठानी,
मेहनत का ही खाती खाना
मेहनत का ही पीती पानी।
कहती थी यह पैन नहीं है,
यह तो है किस्मत तुम्हारी
खूब पढ़ना लिखना बच्चों
बदलेगी तकदीर तुम्हारी।
बदलेगा फिर भारत सारा,
बदलेगी तस्वीर हमारी।।
____✍️गीता

Comments

7 responses to “मेहनत के रंग”

  1. वाह बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      आभार पीयूष जी

  2. Satish Pandey

    खूब पढ़ना लिखना बच्चों
    बदलेगी तकदीर तुम्हारी।
    बदलेगा फिर भारत सारा,
    बदलेगी तस्वीर हमारी।।
    ——— वाह क्या बात है, आपकी लेखनी में अद्भुत प्रेरणा शक्ति विद्यमान है। जो भी लिख रही हैं लाजवाब लिख रही हैं। भाषा, भाव, संवेदना सभी कुछ उच्चस्तरीय है। जय हो

  3. Geeta kumari

    आपकी दी हुई समीक्षा में अद्भुत प्रेरणा और उत्साह वर्धन है सतीश जी ,अभिवादन सर

  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    1. Geeta kumari

      सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार भाई जी🙏

  5. बूढी औरत की मेहनत को प्रदर्शित करती हुई रचना

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