मैं जब-जब अकेला होता हूं

मैं जब-जब अकेला होता हूं,
दर्द के संताप को,
बाहों में लेकर रोता हूं।

खो जाता हूं ,उन यादों में,
उलझे हुए उन ख्वाबों में,
वक्त की जबरई को,
गले लगाकर; खोता हूं,
जब-जब अकेला होता हूं।

कभी अपना ही,
कभी औरों का ,
गम देखकर, मैं हैरान-सा
नींदों को भगाए रहता हूं,
जब जब अकेला होता हूं।

Comments

3 responses to “मैं जब-जब अकेला होता हूं”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    आप सभी का हार्दिक धन्यवाद 🙏

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