मैं तुलसी तेरे आंगन की*****

क्यों जताया जाता है
प्रतिपल
मैं दूसरे घर की लक्ष्मी हूँ
हूं कुछ दिनों की मेहमान
क्यों कहा जाता है
हर पल यह एहसास
होता है कि किस घर की हूँ मैं
अपने ही माँ-बाप कहते हैं
पराई अमानत हूँ मैं
किसी रीति-रिवाज में
बेटियों की जगह नहीं होती
बहुएं ही हर कार्य में हैं आगे होती
जब विवाह होता है
जाती हूँ अपने घर
यह सोंचती हूँ इसकी हर प्रथा मेरी है
शामिल होती हूँ खुशी से
हर रिवाज में
गलती से भी कोई भूल हो जाए तो
खाती हूँ डाट मैं
वो कहते हैं तू तो पराया खून है
तुझे कहाँ पता इस घर का कानून है
कुल को गाली पल में दे दी जाती है
घर की लक्ष्मी पल में पराई हो
जाती है
आखिर कौन है जो मानना है
कहता मुझे अपना
मेरा अस्तित्व बन गया है महज सपना
कोई तो कहे मुझे प्यार से अपना
बता दे ऊपरवाले तू ही मुझे
आखिर किससे कहूँ
” मैं तुलसी तेरे आंगन की” !!

Comments

7 responses to “मैं तुलसी तेरे आंगन की*****”

  1. Chandra Pandey

    सुन्दर लिखा है

  2. Geeta kumari

    नारी को कभी कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उस स्थिति का सलीके से चित्रण किया गया है । लेकिन ये स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रहती है ।ये मेरे व्यक्तिगत विचार और अनुभव हैं। वैसे कविता के शीर्षक के आधार पर बहुत सटीक चित्रण । ऐसी स्थिति कुछ दिन आती तो है ।

  3. बहुत सुन्दर

  4. सुन्दर भाव

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