“मैं हलधर हूँ कहलाता”

नाखूनों से नोंच जमीं
मैंने बोया है
मेहनत का बीज
हलधर हूँ कहलाता
चाहे कह लो
पीर-फकीर
पीता हूँ कुआं खोदकर पानी
बीती निर्धनता में जवानी
पर अपनी मेहनत से
भरता हूँ
मैं सबका पेट
आज मुसीबत
आन पड़ी
हक पे अपनी बात अड़ी
‘भारत बंद है’ तो क्या हुआ ?
कुएं में अभी भी भांग पड़ी
जो होना होगा सह लेंगे
छीन के अपना हक लेंगे
खोदेंगे हम सूखी जमीं
अश्रुओं से अपने सींचेंगे
जो लेकर चाँदी का चम्मच
पैदा हुए हैं राजकुमार
वह हम क्षेत्रपाल की
व्यथा को क्या समझेंगे..!!

Comments

6 responses to ““मैं हलधर हूँ कहलाता””

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर रचना

  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Praduman Amit

    बहुत सुंदर चित्रण।

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