मोहलत

थोड़ी मोहलत मांगता हु रब
बस एक बार उनका दीदार हो जाए
फासले जो फैसलों की वजह से थे
बस उस पर सुलह हो जाए

यूँ रूठना भी कुछ होता है क्या
एक बार मुरना तोह बनता है ना यार
रो तू भी रही थी मैं भी
एक बार मिलाना तो बनता है ना यार

ए खुदा बोल तेरी रज़ा है क्या
इन दूरियों की वजह है क्या
मांग ता कुछ नहीं तुझसे
बस इस बेरुखी की खता है क्या

Comments

11 responses to “मोहलत”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत ही सुंदर

  2. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    आभार आपका

  3. Satish Pandey

    **एक बार मिलाना तो बनता है ना यार** वाह वाह, बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

  4. हूँ।
    एक बार मुड़ना।
    कवि ने प्रेम में हुए बिछोह की वेदना से व्यथित मनुष्य की भावना को उजागर किया है।

    1. Antariksha Saha Avatar

      धन्यवाद भाई

      1. आभार भाई 🙏🙏
        अच्छा लिखा है आपने

  5. Indu Pandey

    अति सुन्दर

    1. Antariksha Saha Avatar
      Antariksha Saha

      धन्यवाद

  6. मन के विचारों को व्यक्त करती सुंदर रचना

    1. Antariksha Saha Avatar
      Antariksha Saha

      धन्यवाद

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