यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)

सच्चा सच में रह गया, ठगा ठगा सा आज।
आशा चोरी कर गए, अपने धोखेबाज।।
जिनके हृदय में रहा, काले धन पर नाज।
वे क्यों ऐसे श्वेत से, आज हुए नाराज।।
भूखा चूहा रेंगता, देख रहा है बाज।
सोच रहा है चैन से, पेट भरूँगा आज।।
अर्थव्यवस्था मंद है, यही सुना है आज।
बेकारी से गिर रही, है यौवन पर गाज।।
मेहनतकश हैं भटक रहे, और खा रहे खीर।
कौन लिख रहा इस तरह, यौवन की तकदीर।।

Comments

4 responses to “यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)”

  1. बहुत ही जबरदस्त दोहे हैं सर

  2. Geeta kumari

    कवि सतीश जी द्वारा प्रस्तुत आज काल के वातावरण का दोहा रूप में बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से किया गया यथार्थ चित्रण । लाजवाब अभिव्यक्ति

  3. Satish Pandey

    कुछ मात्रात्मक कमियां रह जाने के दृष्टिगत मेरे द्वारा यह दोहा कविता डिलीट कर दी गयी है, पुनः सुधार कर प्रस्तुत की जायेगी

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