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  1. वाह प्रज्ञा जी काश!! ऐसा बेटा हर माँ बाप को मिलता। तो आज हमें माँ बाप के प्रति दु:ख भरी कहानी व कविता लिखना नहीं पड़ता। आपकी कविता उन अभागे बेटों के लिए है जो घर में गंगा रहते हुए भी काशी मथुरा तीर्थ करने को जाते है। माँ बाप के लिए बीवी बच्चों को छोड़ दे ज़माने में किसका मजाल है। अति उत्तम चित्रण किया है आपने। यदि सूत की जगह पूत होता तो और अच्छा होता ।दशरथ जी तो आदत से लाचार थे। शिकार करना पशु पक्षी के जान लेना घोर पाप ही तो है। आखिर उनको अपनी करनी का फल तो मिलना ही था। और उधर आज्ञा पालक संतान पा कर उन माता पिता का भी घमंड था। आखिर घमंड किसी न किसी विधि से नष्ट होना ही था।

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