रात को भी धूप आती(कवित्त छंद)

ठंडक की आहट से उठ रही एक डर,
कैसे कटेगा ये जाड़ा मिला न कम्बल गर।
सिर पर छत नहीं, तन ढकने को नहीं,
खुला आसमान है, जीवन है सड़क पर।
सिकुड़-सिकुड़ कर रात काटी अब तक,
फटी हुई चादर में सोया तन ढककर।
अब तक मच्छर थे, चूसते थे तन मेरा,
अब नहीं सोने देती शीत मुझे रात भर।
सड़क किनारे सोता दीन सोचे मन में ये,
रात को भी धूप आती ताप लेता घड़ी भर।
— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत।

Comments

7 responses to “रात को भी धूप आती(कवित्त छंद)”

  1. अद्भुत, लाजवाब

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    गरीब व्यक्ति का रात को भी धूप आने का सोचने की, लाजवाब अभिव्यक्ति है कवि सतीश जी की । रात को भी धूप आने की अनुपम सोच, अनूठा लेखन और कवि की विलक्षण प्रतिभा को प्रणाम

    1. समीक्षागत टिप्पणी हेतु हार्दिक आभार

  3. गरीब के लिए हर मौसम कष्टकर होता है
    यही समझती कवि सतीश जी की रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी

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