रोशनी

तेरे घर की रोशनी क्यूँ देखूँ जब मेरे घर में अंधेरा हो
आखिरी रात न हो जाए कही जब तक हर ओर सबेरा हो
उसकी ख़ुशी हमारे किस काम की जिसे
अहंकार के भूत ने घेरा हो

Comments

2 responses to “रोशनी”

  1. बहुत ही खूबसूरत रचना

  2. राकेश पाठक

    धन्यवाद

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