बस जुमला है !!
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अब तो है
लंगड़ाया शासन
पहले होता था देशों का
अब है हृदयों का विभाजन
मजदूरों की रोटी रूठी
खबरें चलती झूठी-मूठी
हलधर बैठा धरने पर
गरीब की फटती जाए लंगोटी
सिलेण्डर है पर LPG
नहीं है
गेहूं तो है पर दाल नहीं है
कालोनी हैं कागज पर
पेंशन भी है कागज पर
दीया’ तो है पर तेल नहीं है
हमारे शासन में कोई झोल नहीं है
अब सरकार है चलती
मीडिया के बल पर
बंदर लटक रहे
केबल (TV) पर
जो दिखता वो ही बिकता है
ये शासन अब इसी पर चलता है
चुनावी वादे बस जुमला हैं
युवाओं को नौकरी बस जुमला हैं
किसान हो या आम इंसान
सब हैं कितना परेशान
सांत्वना रोकर जो नेता देते हैं
प्रज्ञा’ कहती वह सब भी बस जुमला है….
“लंगड़ाया शासन”
Comments
9 responses to ““लंगड़ाया शासन””
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चरमराते सिस्टम का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है कवि प्रज्ञा जी ने अपनी इस कविता में। बहुत ख़ूब
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बहुत बहुत धन्यवाद दी
यह मेरा आक्रोश है जो फूटकर निकला है-
उत्तम लेखन
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🙂🙂सुंदर रचना 👌👌👌
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धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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धन्यवाद
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आपने वास्तविकता का चित्रण किया है
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जी बिल्कुल
धन्यवाद आपका
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