लकीरें वक्त की

रोज यूं ही नहीं बन जाते हैं अफसाने नये-नये
लकीरें वक्त की बनती बिगड़ती रहती हैं…

Comments

5 responses to “लकीरें वक्त की”

  1. Geeta kumari

    Good

  2. बहुत ही उम्दा लेखन प्रज्ञा जी

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