लड़की हूं!

लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।
न जता सकी उस प्यार को,
फिर भी निभा रही हूं।
शौक रखती थी कुछ पाने का,
अब उसे दबा रही हूं।
कभी कोई सोचता नहीं,
कभी कोई पूछता नहीं ,
तुम्हारी खुशी क्या है?
बस मौन रहकर,
सहमति जता रही हूं।
कर्तव्य है मेरा सेवा करना!
इसलिए बंदिनी बन,
जीवन निभा रही हूं।
ना चाहते हुए भी अपनाए हैं,
चाहे-अनचाहे रिश्तें,
फिर भी मुस्कुरा रही हूं ।
जहां बो सकती थी स्वार्थ के बीज,
वहां खुद ही काटे बिछा रही हूं ।
अब निस्वार्थ होकर मैं,
सिर्फ खुशियां लुटा रही हूं।
मैं लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।

Comments

12 responses to “लड़की हूं!”

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

    1. Pratima chaudhary

      Thank you

  1. Geeta kumari

    यथार्थ चित्रण…. बहुत सुंदर रचना

    1. Pratima chaudhary

      बहुत बहुत आभार 🙏

  2. Deep

    bahut achha..!

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