लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।
न जता सकी उस प्यार को,
फिर भी निभा रही हूं।
शौक रखती थी कुछ पाने का,
अब उसे दबा रही हूं।
कभी कोई सोचता नहीं,
कभी कोई पूछता नहीं ,
तुम्हारी खुशी क्या है?
बस मौन रहकर,
सहमति जता रही हूं।
कर्तव्य है मेरा सेवा करना!
इसलिए बंदिनी बन,
जीवन निभा रही हूं।
ना चाहते हुए भी अपनाए हैं,
चाहे-अनचाहे रिश्तें,
फिर भी मुस्कुरा रही हूं ।
जहां बो सकती थी स्वार्थ के बीज,
वहां खुद ही काटे बिछा रही हूं ।
अब निस्वार्थ होकर मैं,
सिर्फ खुशियां लुटा रही हूं।
मैं लड़की हूं लड़की होने का,
दस्तूर निभा रही हूं।
लड़की हूं!
Comments
12 responses to “लड़की हूं!”
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सही है..
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🙏🙏
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Nice
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Thank you
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बहुत खूब
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Thank you
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Nice lines
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धन्यवाद जी
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यथार्थ चित्रण…. बहुत सुंदर रचना
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बहुत बहुत आभार 🙏
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bahut achha..!
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Thank you
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