लाशों की सेज पर

सोची समझी चाल से, शायद जानबूझकर
पार्टियां वे कर रहे, विश्व को मौत में ढकेल कर।
जिस वुहान से इसकी शुरुआत हुई
इससे निजात की, तैयारी थी क्या कर रखी।
मास्क को दे तिलांजली, दुनिया का नुकसान कर
हजारों मासूम लोग जा रहे, काल का ग्रास बन ।
लाशों की सेज बिछा चैन वे अलाप रहे
लद्दाख पे आके, असलियत दिखा रहे ।
जब सब कोई सहमा सा, दुआ है कर रहा
तब वे अंधान्ध हो सीमा पर, चील सा मंडरा रहा।
जमीर जिनमें थी नहीं, जिनकी नियत भी खोटी है
औकात उनकी बताने को तैयार अपनी बोटी-बोटी है ।

Comments

10 responses to “लाशों की सेज पर”

  1. Satish Pandey

    यथार्थ पर आधारित बहुत सुन्दर रचना, बहुत खूब

    1. सादर आभार

  2. Pratima chaudhary

    भारत-चीन के राजनैतिक मुद्दों से जुड़ी सुन्दर कविता

    1. सादर आभार

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    सुन्दर काव्य

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  4. यथार्थपरक

    1. सादर आभार प्रज्ञा जी

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