दिन गुजर जाता है
सदा सुबह शाम वाला।
वक्त का घोड़ा अगर
होता लगाम वाला।।
कोई कहीं भी इसको
सशक्ति खींच लेता।
चाबुक भला क्यों न मारे
हिलने नहीं वो देता।।
पल भर कहीं न रुकता
चलता सदा हीं जाता।
जो पीठ पर है बैठा
मंजिल वही तो पाता।।
क्षण एक न गवाओ
आलस में विनयचंद।
वरना ये द्वारे कामयाबी
हो जाएगें एकदम बंद।।
वक्त का घोड़ा
Comments
6 responses to “वक्त का घोड़ा”
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Bahut khub
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Dhanywad
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Bahut achey
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nice
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Nice
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वाह
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