विश्वास का आगाज़

कुछ लोग हमारी संस्कृति को पिछड़ेपन का नाम देते हैं।
हंस के पश्चिमी संस्कृति की उतरन थाम लेते हैं ।।
घर हो या सङक शालीनता हो अपनी झलक
नकल किसी और की क्यूँ करे,
स्वसंस्कृति को आत्मसात करने की हो ललक
हमारे लिवास हमारी सौम्यता की पहचान देते हैं
हंस के पश्चिमी—-
खुलापन कहाँ कबतक साथ निभाएगा
सादगी ही हमें आगे का पथ दिखाएगा
क्रियाकलाप हमारी तहजीब का पैगाम देते हैं
हंस के पश्चिमी——-
पीपल का पूजन हो,तुलसी साँझ की बाती
घण्टी आरती से भी,आती विज्ञान की पाती
रीति हमारी संयमित जीवन का अंदाज देते हैं
हंस के पश्चिमी——-
उगते सूर्य को जलार्पण,ढलते सूर्य से संध्याबंदन
हर दिन से जुङा कोई व्रत, नियम, संयम, तर्पण
अंधविश्वासी नहीं,
बुझते मन में विश्वास का आगाज़ करते हैं
हंस के पश्चिमी——-
हमारा बचपन भले माटी के संग,भूतल पर बीता है
मगर मन में है रामायण , तन में कर्म की गीता है
हिंसा की नीति नहीं,अहिंसा का हम प्रचार करते हैं
हंस के पश्चिमी——
सुमन आर्या

Comments

5 responses to “विश्वास का आगाज़”

  1. Vasundra singh Avatar

    बहुत सुंदर

  2. बहुत खूब

  3. शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को

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