धरती जल रही अम्बर जल रहा
जल रहा सकल जहान ।
हाल कहे क्या पशु-पक्षियों के
हैं व्याकुल सब इन्सान ।।
सघन छाँव करके मैं तरूवर
सबको पास बुलाया ।
खुद जलकर सूरज किरणों से
सब की जान बचाया ।।
खाया पीया बैठ यहाँ पर
सब भागे जल के भीतर ।
छम-छम छप-छप छपाक -छप-छप
केहरि मृग अहिगण और तीतर ।।
मस्त मगन हो नहा रहे सब
पशु पक्षी संग-संग इन्सान ।
‘विनयचंद’ कोई मुझे भी ले चल
बीच दरिया में करूँ स्नान ।।
वृक्ष की व्यथा
Comments
11 responses to “वृक्ष की व्यथा”
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सुंदर रचना
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Thanks
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nice
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Thanks
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Sundar Abhivyakti
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Thanks
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Nyc
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सुंदर परंतु पंक्तियाँ कुछ उलट पलट हैं। अर्थात् तुकान्त के चक्कर में अपनी पहचान खो रही हैं
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बेहतरीन
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बहुत खूब,
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बहुत सुंदर पंक्तियां
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