वो मेरा जीवनसाथी था….
मेरे सुंदर चेहरे और मीठी आवाज
पर टिका थे वो रिश्ते
जब आवाज घरघराने लगी
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गईं
ढल गई जवानी
शाम-सी जब
दर्पण भी नजर चुराने लगा
तब टूट गये सारे रिश्ते
सब छोंड़ गये
मुझको मरते
तब दिया सहारा
जिन बाँहों ने
सहलाया जिसने हाँथों से
वह मेरा जीवनसाथी था
जो मेरे सुंदर चेहरे पर नहीं
सुंदर हृदय पर मरता था
उस समय समझ आया मुझको
ये जो सम्बंध होते हैं
वो सुंदर
हृदय और अटूट विश्वास पर
चलते हैं…..
अतिसुंदर
Thanks
वाह जी वाह
प्रज्ञा जी आपकी कविता हमें बहुत आनंदित करती है हर एक आप लिखती रहे हम सब पढ़ते रहे
आपके इस कमेंट से पता चला मुझे कि आपको मेरी कविताए पसंद आती हैं
बहुत शुक्रिया
वाह प्रज्ञा जी बहुत ही सुंदर कविता है। ये पंक्तियाँ और भी बेहतरीन हैं-
जो सम्बंध होते हैं
वो सुंदर
हृदय और अटूट विश्वास पर
चलते हैं…..
जी, जीवन की सत्यता यही है अक्सर हम शारीरिक सुंदरता के प्रति आकर्षित होते हैं जबकि वह नश्वर होती है
सुन्दर
Thanks
जीवनसाथी की महत्ता को बताते हुए तथा शारीरिक सौंदर्य वासना को नकारते हुए जिस प्रकार आत्मीयता को तथा आंतरिक सुंदरता के बारे में वर्णन किया गया है प्रज्ञा जी आपके द्वारा वह आपकी प्रखरता को काव्य प्रतिभा को प्रदर्शित करता है यह काम बहुत ही दूभर था परंतु आपने जिस प्रकार कर दिखाया वहां अचंभित करता है