पथ पथ ख़ुशी की खोज में भटकता रहता हूँ
उसके नूर के लिए तरसता रहता हूँ
वो है हमसे खफा
उस से मिलने के लिए
भेस बदलता रहता हूँ
पैसा पा लिया
शोहरत पा ली
फिर भी सोचता हूँ
कहा मिली ख़ुशी
उसको ही खोजता हूँ
असली नकली ख़ुशी में क्या फर्क है
बस वही समझता रहता हूँ
दर दर भटक के थक गया
अपनी ज़िन्दगी से पक गया
आखिर में सोचा
दिल की सुन लेता हूँ
दिल बोला सुनो मेरी बात
क्यों भटकता हो दरबदर
ख़ुशी तो तुम्हारे साथ
ये सुन झाँका अपने मन के भीतर
सोचा कितना बड़ा हूँ बेवकूफ
सच्ची में ख़ुशी तो है अपने अंदर
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