12 Comments

  1. सच में समय बङा बलवान है।
    देखते-ही-देखते  बचपन बीता और कयी जिम्मेदारी आन पङती है।
    जिनकी गोद में खेले वही बुढ़ापे में आ गये
    जिनकी अंगुली पकड़ चलना सीखे, 
    आज़ बिस्तर पर उन्हें देख
    वक्त की ताक़त का आभास हो रहा
    आने वाले वक्त के आइने में अपनी अक्श दिखती है।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी, आपने समीक्षात्मक टिप्पणी के रूप में बहुत सुंदर पंक्तियाँ लिखी है। बिल्कुल सच्ची बात लिखी है आपने।

  2. बीतता जा रहा है निरन्तर
    वक्त रुकता कहाँ है किसी को
    दिन उगा, दोपहर- रात फिर
    चक्र है यह घुमाता सभी को।
    . ……. जीवन की सच्चाइयों को बयान करती हुई कवि सतीश जी की, सच्ची व सुन्दर रचना

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