सबके के सब मिट्टी के मोल है ।
सबके के सब मिट्टी के मोल है ।
पैसा, धन-दौलत किसके संग है ।
आज जो सड़क का भिखारी है ।
कल वह अपनी मुकद्दर का दाता है ।।1।।
किसका क्या है जहां में ये किसने जाना है ।
जिसने जाना, उसने तब से जिन्दगी संभाला है ।
और के भरोसे जिन्दगी किसने कब-तक जिया है ।
और तो केवल कुछ दिन के मेहमान है, अपना हाथ करतार है ।।2।।
कब-तक जिओगे जिन्दगी घुट-घुट के ।
यूँही कब-तक बर्बाद करोगे समय की इस धारा को ।
बहता चला गया जो हवा लौट नहीं आता है ।
यूँही हाथ मलता रह जाओगे कुछ नहीं पाओगे ।।3।।
पैसा, धन-दौलत सब-के-सब यूँही रह जायेंगे ।
तेरे तन को आखिर कफन से ही लिपटा जायेगा ।
मिट्टी, हवा, आग, आकाश, नीर में तु मिल जायेगा ।
यूँही तेरा सबकुछ भौतिक रत्न तेरे काम नहीं आयेंगे ।।4।।
कवि विकास कुमार
बहुत बड़े कवि हैं आप
कितनी सारी रचनायें एक साथ और वो भी अच्छी-अच्छी।
विकास जी बस इतनी ही हैं या अभी और भी हैं।
आप ऐसे ही लिखते रहें।
गजब
बाॅलीवुड के लिए गीत लिखो कामयाब हो जाओगे
विकास जी ने तो कविताओं की बाढ़ ही ला दी है सावन पे
Well done Vikas ji keep it up
शुक्रिया बड़ो बुजुर्हगों एवं मेरे साथियों . ।।
शुक्रिया बड़ो बुजुर्हगों एवं मेरे साथियों . ।।
शुक्रिया बड़ो-बुजुर्गों एवं मेरे साथियों ।। सदर नमन ।।