अंगुली पकङ चलना सिखाया
गिर-गिर कर संभलना सिखाया
मुश्किलों में भी हंसना सिखाया
भय-स्नेह से सही-ग़लत में भेद बताया
हर दांव-पेंच को समझना सिखाया
इस जीवन से परिचय करवाया
मुझे इस धरा पर इक पहचान दिलाया
क़िस्मत के धनी सिर पे जिनकी पिता का साया
सर पे रहे पिता का साया
Comments
4 responses to “सर पे रहे पिता का साया”
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अंगुली पकङ चलना सिखाया
गिर-गिर कर संभलना सिखाया
…… पिता पर लिखी गई बहुत सुन्दर पंक्तियाँ-

सादर आभार
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बहुत खूब
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बहुत सुन्दर
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