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मेरी किस्मत रंगी है काले
रंग में
दर्द ही है जीवन के हर
अंग में..
आँसुओं की लकीरें कभी
मिटती नहीं बल्कि
और गहरा जाती हैं
जब किसी की बातें मेरे
दिल को दुःखाती हैं..
बेवजह कैसे कोई अपमान
कर सकता है ?
आखिर कब तक कोई ये
कड़वा घूँट पी सकता है..
मुस्कुराने की हर वजह
मुझसे रूठ जाती है
होंठों की मुस्कान आँख का
आँसू बन जाती है..
चली जाऊंगी एक रोज
ये जहान छोंड़कर
मुड़ के ना देखूंगी ना आऊंगी
लौटकर..
चाहे कितने भी दर्द मिलें
सब सह लूंगी
ससुराल की सूखी रोटी का
भी मान रख लूंगी..
तकलीफें बर्दास्त के बाहर
हुईं तो मर ही जाऊंगी
पर मायके कभी लौटकर
ना आऊंगी..
ससुराल की सूखी रोटी…
Comments
6 responses to “ससुराल की सूखी रोटी…”
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यही है सीता और सावित्री की पावन कहानी।
अमर इतिहास और लोगों की निर्मल जुबानी।।
मुड़ के देखा जो सती ने एक बार।
सिवा एक माँ के कोई किया न सत्कार।।
बहनों की मुस्कुराहट और पिता का व्यवहार।
पीड़ हृदय की सह न पाई और छोड़ गई संसार।।
बेहतरीन भाव और अतिसुंदर रचना।।-

सही कहा विनय जी बहुत धन्यवाद आपका
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अत्यंत मार्मिक रचना ।
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धन्यवाद
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बहुत सुंदर प्रस्तुति
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धन्यवाद
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