रात और दिन का मिलन साँझ है सखी,
कब मिलोगे टकटकी में आंख है सखी।
आ रही है रात दूर जा रहा दिन
खोल कर कपाट दिल के झाँक ले सखी।
साँझ है सखी
Comments
5 responses to “साँझ है सखी”
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वाह सर अतिसुन्दर
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वाह क्या खूब
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अतीव सुन्दर,उम्दा
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सुंदर
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कवि सतीश जी ने सांझ और सखी के माध्यम से बहुत ही सुन्दर रचना की है । प्रेम पूर्ण भाव ,बहुत सुंदर भावभिव्यांजना है,अति सुंदर कविता
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