शब्दों में नहीं तो खामोशी ही सही,
किसी ज़ुबां में तो तू निकल कर सामने आ,
कब तलक छुपता रहेगा तू राज़ अब दिल में,
खुल कर अब किसी सच सा तू निकल कर सामने आ,
खेल हैं कई और खिलौने भी बहुत हैं ज़माने में,
छोड़ कर बचपना तू अब हकीकत में निकल कर सामने आ॥
राही (अंजाना)
सामने तो आ
Comments
8 responses to “सामने तो आ”
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Bahut bha gai aapki raaz. Ko sajha Karne ki ada
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ह्रदय से आभार भाई
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Kaabil e Taareef
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धन्यवाद् मित्र
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Badiya Saxena Sab
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धन्यवाद भाई
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Welcome Bhai
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सुन्दर रचना
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