देख सखी, सावन की सुन्दर
गीली – गीली सुबह सुहानी
घिरे हुए हैं बादल नभ में
चारों ओर बरसता पानी।
सूरज की किरणों ने शायद
खुली छूट दे दी बादल को,
तभी घेरकर नभमंडल को
खूब बरसने की है ठानी।
अब रिमझिम की बात नहीं है
खुलकर बरस रहे हैं बादल,
लाया सावन वर्षा ऋतु की
युवावस्था और जवानी।
तड़-तड़, तड़-तड़, झम-झम झम-झम
चारों ओर बरसता पानी,
सावन की यह सुबह सखी
कितनी निर्मल, कितनी मस्तानी।
—– डॉ0 सतीश पाण्डेय
सावन की यह सुबह सखी
Comments
5 responses to “सावन की यह सुबह सखी”
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सावन की प्राकृतिक छटा का मनोरम चित्रण
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सादर धन्यवाद जी
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पावस का सजीव चित्रण
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सादर धन्यवाद शास्त्री जी
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सुन्दर भाव पूर्ण रचना
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