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  1. सिसक रही तन्हाई
    अब क्या साथी से होगा ?
    जब मन के घाव बने नासूर
    तब मरहम से क्या होगा ?
    ____________ अपने साथी को तनहाई में याद करती हुई कवि प्रज्ञा जी की, बेहद मार्मिक रचना। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  2. सिसक रही तन्हाई
    अब क्या साथी से होगा ?
    जब मन के घाव बने नासूर
    तब मरहम से क्या होगा ?
    हम तो अपने ही घर में
    हाँ, हो गये एक रोज पराये
    बन बैठे आज फफोले
    थे जो तुमने घाव लगाये..
    हृदय के घावों को शब्दों में पिरोकर लिखी गई रचना

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