सिसक रही तन्हाई, अब साथी से क्या होगा ????

सिसक रही तन्हाई
अब क्या साथी से होगा ?
जब मन के घाव बने नासूर
तब मरहम से क्या होगा ?
हम तो अपने ही घर में
हाँ, हो गये एक रोज पराये
बन बैठे आज फफोले
थे जो तुमने घाव लगाये
अभिमन्यु- सा तुमने
मुझको चक्रव्यूह में घेरा
जब हाथ था मैने बढा़या
तब तुमने ही था मुंह फेरा
मंजिल-मंजिल करके तुम
फिर मुझसे दूर गये थे
क्या भूल गये वो दिन तुम
जब मुझसे दूर गये थे…

Comments

16 responses to “सिसक रही तन्हाई, अब साथी से क्या होगा ????”

  1. Geeta kumari

    सिसक रही तन्हाई
    अब क्या साथी से होगा ?
    जब मन के घाव बने नासूर
    तब मरहम से क्या होगा ?
    ____________ अपने साथी को तनहाई में याद करती हुई कवि प्रज्ञा जी की, बेहद मार्मिक रचना। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

    1. बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर मार्मिक भाव प्रस्तुत करती हुई रचना

    1. आभार है आपका सर
      आपकी आलोचना मन भाती है

  3. This comment is currently unavailable

  4. This comment is currently unavailable

  5. वाह!!
    लोकप्रिय कवि प्रज्ञा जी का अद्भुत लेखन
    काबिलेतारीफ है

  6. काबिले तारीफ रचना

  7. बहुत ही लाजवाब अभिव्यक्ति

  8. वाह वाह क्या बात है
    शानदार प्रस्तुति

Leave a Reply

New Report

Close