सोंधी-सोंधी गाँव की यादें….

सोंधी-सोंधी गाँव की यादें
चौपाटी पर परधानी की बातें
पके-पके से स्वर्णिम धान
गाँव के बूढ़े, बाल, किसान
सब आते हैं मुझको याद
गोरी के गोरे-गोरे गाल
जिन पर हँसकर झूले लट
ना भूला मैं वह पनघट
जहाँ भरा करती थी पानी
जोरू, बहना और बूढ़ी नानी
माँ की वह चूल्हे की रोटी
सरसों का साग और गुण मीठी-मीठी
माँ पोंछ के आँचल से तब देती
लगी राख जो रोटी में होती
घी की मोटी परत लगाती
दूध में रोटी मसल खिलाती
बाबा की पगडण्डी और
नहरों की वो तैराकी
आज बड़ा ही याद आये
गाँव के छूट गये जो साथी….!!

Comments

9 responses to “सोंधी-सोंधी गाँव की यादें….”

  1. बहुत खूब, सुन्दर भाव, सुन्दर शिल्प

    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका सराहना हेतु

  2. Geeta kumari

    वाह गांव की यादों पर बहुत सुंदर कविता

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

      1. Geeta kumari

        Welcome Dear

  3. आपने वास्तव में गांवों का यथार्थ चित्रण किया है

    1. धन्यवाद आपका संदीप जी

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