स्याही मेरी सूख गई अब

कुछ लिखने का मन ना करता
शब्द न जाने छीने किसने
बिखरी-बिखरी मेरी कल्पनाएं
रूढ़ हुए जाते सपने
प्यारी लगती अब तो तन्हाई
मीठी मीठी तेरी यादें
पर फिर भी ना लिख पाऊं मैं
स्याही मेरी सूख गई अब
कलम भी ना अब डिग पाए

Comments

8 responses to “स्याही मेरी सूख गई अब”

  1. राकेश पाठक

    निराशा का सहज चित्रण

  2. सुंदर पंक्तियां

  3. This comment is currently unavailable

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