बंदिशें कितनी लगाई गईं
पहरे कितने दिये गए
फिर भी ना मिट सकी मोहब्बत
हीर-रांझा कितने ही चल बसे
प्रगाढ़ होती गई मोहब्बत
हद से बढ़ता गया जुनून
जितनी तकलीफें मिली
मजनुओं को सब सहते
चले गये
रात-दिन की यही हालत है
जो भी प्यार के पंछी हैं
जीते रहे मोहब्बत में
और मोहब्बत में ही मर गये…
हीर-रांझा
Comments
6 responses to “हीर-रांझा”
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मोहब्बत करने वालों की राह में आने वाली बाधाओं और बाधाओं के बावजूद प्रगाढ़ होती मोहब्बत के संदर्भ में अतिसुन्दर रचना। कथ्य के प्रस्तुतिकरण में पूर्ण सफलता। बहुत खूब
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इतनी प्यारी समीक्षा के लिए धन्यवाद
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“मोहब्बत करने वालों का यही है एक अफसाना, तड़पना चुपके चुपके आह भरना , घुट के मर जाना । वाह, प्रज्ञा इस कहावत को चरितार्थ करती हुई बहुत सुंदर कविता है । श्रृंगार के वियोग पक्ष की सुंदर प्रस्तुति ।
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बहुत शुक्रिया दी
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Atisunder kavita
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आभार
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