होली पर ना पीना हाला

होली पर ना पीना हाला,
हानि देता है बदन को
इसका एक छोटा सा प्याला
गुजिया खाओ लड्डू खाओ,
रंग लगाकर मौज उड़ाओ
अभी जवाॅं हो अभी युवा हो,
अभी तो देगी यह अभिराम
धीरे-धीरे तन को पीती,
जला देती है ऐसी ज्वाला
व्याधि दे जाती है कोई
जिसका कोई तोड़ नहीं है,
कर दे मुस्तकबिल को काला l
मित्रों का ना करो बहाना
टालो जितना जाए टाला l
हाला से तुम दूर ही रहना,
पड़ ना जाए इससे पाला॥
_____✍गीता

Comments

12 responses to “होली पर ना पीना हाला”

    1. धन्यवाद पीयूष जी

  1. Satish Pandey

    होली पर ना पीना हाला,
    हानि देता है बदन को
    इसका एक छोटा सा प्याला
    गुजिया खाओ लड्डू खाओ,।
    ——– बहुत उत्तम सृजन। बहुत सुन्दर कविता। लेखनी की निरंतरता को सैल्यूट।

    1. Geeta kumari

      उत्साह वर्धन करने के लिए और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी अभिवादन सर

  2. बहुत सुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      आभार सर

  3. vikash kumar

    Motivated poem
    I salute your your poem

    1. Geeta kumari

      Thank you very much Vikash ji

  4. अतिसुंदर विचार

    1. सादर धन्यवाद भाई जी🙏

  5. होली पर ना पीना हाला,
    हानि देता है बदन को
    इसका एक छोटा सा प्याला
    गुजिया खाओ लड्डू खाओ,
    रंग लगाकर मौज उड़ाओ
    ___सुंदर संदेश देती हुई रचना

    1. Geeta kumari

      Thanks

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