होली

छुअन तुम्हारी अँगुलियों की,
मेरे कपोलों पर, आज भी मौजूद है,
तुम्हारी आँखों की शरारत मेरी,
तासीर की हरारत में, आज भी ज़िंदा है,
तुम तसव्वुर में जवान हो आज भी,
हमारी मुहब्बत की तरह,
हर मौसम परवान चढ़ता है रंग तुम्हारा,
एक ये एहसास ही काफी है मुझे के,
तुमने मुझे चाहा था कभी अपनी सांस की तरह,
वक्त गुज़रा हज़ारों सूरज ढल गए,
तुम्हें पता है क्या…………….
मैं अभी तक वहीं खड़ी हूँ किसी तस्वीर की तरह,
होली के दिन तेरी यादों के रंग से भरी,
मेरी ये तस्वीर मुझे कांच की तरह साफ़ लगती है,
बस इसलिए हर होली मुझे बहुत ख़ास लगती है……….
स्वरचित ‘मनीषा नेमा’

Comments

3 responses to “होली”

  1. Saavan Avatar

    कविता की आरंभिक पंक्तियों में शब्द चयन प्रभावशाली है..जैसे आँखों की शरारत…तासीर की हरारत|ये पक़्तियां बिंब निर्माण में सक्षम है| “खड़ी हूँ किसी तस्वीर की तरह” में बिंब प्रखर रूप में निखर के सामने आते है| काव्य के अन्य गुण भी इसमें समाहित हैं, जिसमें कल्पना और भावना समग्र रूप में प्रस्तुत हुई है|

  2. Abhishek kumar

    Superb

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