दिन आ रहे मधुमास के

दिन आ रहे मधुमास के
शीत है भयभीत
खुशनुमा वातावरण ले रहा अँगड़ाइयाँ
तोड़ हिम के आवरण कह गई कोकिला कान में
कुहास के दिन आ रहे मधुमास के |

गुनगुनी सी धूप होगी मधुभरी सी सुनहरी
मंजीरे बजाने आ रही मधुमती सी
मधुकरी मकरंद ले कर
झूमते झोंके झुके सुवास के |

तितलियों से भर गईं क्यारियाँ फुलवारियाँ
कलियाँ सियानी मारती रस गंध की पिचकारियाँ
ढपली बजाते मधुप चंचल फागुनी उल्लास के |

अब जलेंगीं अवदमन की थरथराती होलियाँ
देखना है राजपथ पर कब तक बँटेंगीं थैलियाँ
द्वार खुलने को विवश हैं अब नए आवास के |

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Responses

  1. कलियाँ सियानी मारती रस गंध की पिचकारियाँ
    ढपली बजाते मधुप चंचल फागुनी उल्लास के |
    बहुत अच्छा लिखा है

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