एक शाम के इंतज़ार में

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो

मुदत्तों भागते रहे खुद से

जो चाहा तुमने न कहा खुद से

तुम्हारी हर फर्माइश पूरी कर लेने को

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो

मैं हर किवाड़ बंद कर लूँ

के कोई दरमियाँ आ न सके

बस ढलते सूरज की रौशनी में हम दोनों

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो

ढेरो शिकायतें शिकवे गिले

जो अब तक दिल में हैं दबे पड़े

उन्हें तुम्हारे सीने में छूप के कह लेने को

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो

हो हर सुबह शुरू तुमसे

और रात आँखों में कटे

जैसे लम्बे इंतज़ार की थकान बाकी न हो

कोई शाम ऐसी भी तो हो

जब तुम लौट आओ घर को

और कोई बहाना बाकी न हो

Comments

16 responses to “एक शाम के इंतज़ार में”

    1. Archana Verma

      thank you

    1. Archana Verma

      thank you

    1. Archana Verma

      dhnyawad

    1. Archana Verma

      shukriya

  1. NIMISHA SINGHAL Avatar

    Aaoge jab tum saamne angna Phul khilenge

    1. Archana Verma

      hahah, es gane ki line share karna ka tatparya

      1. NIMISHA SINGHAL Avatar

        जब तुम लौट आओगे तो अंगना फूल खिलेंगे
        दिल बाग बाग हो जाएगा

      2. Archana Verma

        haa sahi kaha

    1. Archana Verma

      dhnyawad

  2. Archana Verma

    dhnyawad

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