गाँव की एक रात

काली आधी रात में,
दुनिया देख रही थी सपने |
आलस का आलम था चहु ओर
रात भी लग रही थी ऊंघने |

तब मैंने छत से देखा,
बतखो के झुण्ड को तलाब में |
ठंडी हवा भी चलने लगी,
रात के आखरी पहर मे |

मछलिया खूब उछाल रही थी,
फड़ फाड़ा रही थी इधर उधर |
सोचा हाथ लगाउ उनको,
पर ना जाने गई किधर |

तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान में,
बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति में |
जैसे वो सब मस्त है आजादी में,
मैंने भी आजादी महसूस की उन सबकी संगति मे |

Comments

9 responses to “गाँव की एक रात”

  1. Ishwari Ronjhwal

    Very gud

  2. Satish Pandey

    Ati sundar

  3. Satish Pandey

    waah waah

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