राम नरेशपुरवाला, Author at Saavan's Posts

खुदगर्ज

सोचो अगर हर जीव खुदगर्ज हो जाता पल पल हर पल थम सा जाता ना पेड़ देता फल कोई वह पेड़ पर ही सड़ जाता वह जाओ ना देते तो पथिक रास्ता कैसे तय कर पाता नदिया जो पानी ना देती हर जीव प्यासा मर जाता वह समंदर में ना गिरती तो हर घर पानी में बह जाता ना मां देती जन्म बच्चे को जीवन मरण चक्कर रुक जाता जो हो जाती खुदगर्ज वह कोई घर नहीं बस पाता हवा अगर थम जाती तो दम सभी का घुट जाता वह ना हर जगह बहती तो जीवो का प्राण... »

मोह

उड़ चलता है हर पक्षी घोंसला बनाने होते ही उम्मीदों का सवेरा श्याम को थक्कर ढूंढता फिरे अपना ही रैन बसेरा भटकती फिरे हर मधुमक्खी फूल फूल पत्ता पत्ता करके शहद इकट्ठा हजारों फूलों को छानती बार-बार पहुंचती देखने अपना छत्ता इंसान भी मोह का पुलिंदा हैमो परिवार की फिकर उसे सताती रहती है मुंह के बस में हर प्राणी सृष्टि सारी यही कहती है »

भौर

बाला घट भरने चल पड़ी भौर की लालिमा नभ मे बिखर पड़ी पगो से रोंदते हुए ओंस की बूँद बाला पनघट की ओर मुड़ चली. रस्सी खींचती सुकोमल हाथों से बिन कहे ही कहती बातें आँखों से हार गया तुम्हारी मनमोहनी चालो से सुंदरता का बखान कैसे करू मै तुछ बातों से. घट सर पर रख मंद- मंद मुस्काए नखरे करें और खूब इतराए कमरिया तेरी लचकती जाये अधजल गगरी छलकती जाये. देखता उसे मै रह गया गाँव की गलियों मे वो खो गई कुछ डग भरे उसकी ओ... »

मजदूरो के बच्चे

मेरे घर के सामने मजदूरो का जमावड़ा लगा था ईंटो का ढेर बड़ा था शायद कोई बंगला बन रहा था. कोई मजदूर ईंटे ढो रहा था कोई दीवार चिन रहा था हर मजदूर काम मे लगा था बच्चों की कोई परवाह नहीं कर रहा था. हम अपने बच्चों को धूल भी नहीं लगने देते है और मजदूरो के बच्चे देखो किस तरहा मिटटी मे लेटे है. मिटटी उड़ा उड़ा कर खेल रहे है मजदूरों के बच्चे सब अपने कर्मो का खाते ये कहते है हम वचन सच्चे गाढ़ा पसीना बहाया अपने पर... »

पथिक

जीवन की राह को नंगे पैर ही नापना पड़ता है मिटटी की गर्मी को छूकर ही भापना पड़ता है चलते चलते कभी रेत के टीले राह रोक लेते है मै डर जाऊ मै घबराऊ इसका ही तो मजा लोग लेते है राह मे कांटे आए जब रोता चलता रहा मै पथिक पर जीना छोड़ दू मन मे विचार ना आया तनिक. सारा मनोबल टूट गया मेरा जब राह मे एक बड़ा पत्थर आया उससे भी मै बच गया क्योंकि साथ था मेरे माँ-बाप का साया. एक मोड़ पे मुझे कुछ लोग मिले नेंन उनके ईर्ष्य... »

नशा

तू होनहार था तू सबसे होशियार था सबका तू गुरुर था अपनी प्यारी सी जिंदगी मे सपना तूने भी कोई देखा तो जरूर था झुक गया गमों के आगे दुनिया नाचे पैसे के आगे तब तो तू मजबूर था क्यों खोया लत मे ऐसा बहाया पानी की तरहा माँ-बाप का पैसा गुनाह करना भी तुझे मंजूर था तुझपे नशे का ऐसा भी क्या सरूर था छूटते जा रहे अपने तोड़े क्यों तूने अपनों के ही सपने ये करना क्या जरूर था तू इतना क्यों मजबूर था भागता रहा बस नशे के... »

आतिशबाजी

वो आतिशबाजी किस काम कि जो कानो को बहरा कर दे अगले ही दिन प्रदूषण से वातावरण को धुए से भर दे. मै तो चाहूँ ऐसी लड़ी जलाना कि जिंदगी फुलझड़ी जैसी जगमग हो चाहूँ ऐसा अनार जलाना जिसमे खुशियों कि फुहार पग पग हो. ऐसा फोड़ू मुस्कुराहटो का सुतली बम जो लोगो का दिल उत्साह से भर दे ऐसा जलाऊ उमंगो का रॉकिट जो आसमान रंगबिरगी खुशियों से भर दे. »

दीपावली का अगला दिन

हम अपने घरों का का कोना कोना चमकाते है ताकि अच्छे से मना सके दीपावली का दिन और कितना कूड़ा फैला देते है दीपावली के दिन ही दिन. छिड़कते है गंगाजल वातावरण स्वच्छ बनाने को ताकि घर पवित्र रहे दीपावली के दिन और इतने पटाखे फोड़ते है कि धुआँ धुआँ कर देते है दीपावली के अगले ही दिन. काम से छुट्टी करके मनाते है दीपावली का दिन तीन गुना गाड़ियां भगाते है सड़को पर दीपावली के अगले ही दिन. देश का सबसे बड़ा त्यौहार है ... »

सर्दियाँ

याद करना कभी तीस साल पहले क़ी सर्दियाँ बिस्तर से ना निकलने की कभी होती थी मार्जियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ स्कूल से छुट्टी मरने के लिए खूब लगाते थे अर्जियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ रजाई मे ही पड़े रहते और खूब खेलते थे पर्चियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ वो सुहाना मौसम अब कहाँ ना जाने अब कहाँ गई वो इतनी ठंडी सर्दियाँ. »

औरत

औरत तेरी कहानी जैसे बहता पानी महानता तेरी जगमानी वेग है तू जबरदस्त तूफानी. पर्वतों मे तू नदी वेगवाहिनी मैदानों मे तू स्थिर विरानी खेतो मे तू अन्न गर्भ धारणी महान होकर भी तू सदाचारणी. धरातल मे तू पाताल वासनी पालन करे तू पालनहारिणी गृह उद्धारक तू ह्रदय वासनी सृष्टि का आरम्भ तू और जग कल्याणी. »

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