राम नरेशपुरवाला, Author at Saavan's Posts

पूस की रात

पूस की रात मे दुनिया देख रही थी सपने आलस फैला था चहु ओर रात भी लगी थी ऊँघने. मैंने छत्त से देखा बतखों के झुण्ड को तलाब मे तीर सी ठण्डी हवा चलने लगी थी रात के आखरी पहर मे. मछलिया खूब उछल रही थी तेर रही थी इधर -उधर सोचा हाथ लगाउ उनको पर ना जाने छुप गई किधर. तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान मे बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति मे जैसे वो सब आजाद है मेने भी खुद को आजाद महसूस किया उनकी स्वछंद संगती मे. ….. ... »

दुआ

आते नहीं मुझसे मिलने तुम हमसे अक्सर ये गिला किया करते छोड़ दिया है उन गलियों में जाना जिनमें हम कभी मिला करते थे चाह कर भी तेरे दर पे ना आ सके तेरी सलामती की हमेशा दुआ करते थे बदनाम ना हो जाओ तुम कहीं मन ही मन डरा करते थे »

खुदगर्ज

सोचो अगर हर जीव खुदगर्ज हो जाता पल पल हर पल थम सा जाता ना पेड़ देता फल कोई वह पेड़ पर ही सड़ जाता वह जाओ ना देते तो पथिक रास्ता कैसे तय कर पाता नदिया जो पानी ना देती हर जीव प्यासा मर जाता वह समंदर में ना गिरती तो हर घर पानी में बह जाता ना मां देती जन्म बच्चे को जीवन मरण चक्कर रुक जाता जो हो जाती खुदगर्ज वह कोई घर नहीं बस पाता हवा अगर थम जाती तो दम सभी का घुट जाता वह ना हर जगह बहती तो जीवो का प्राण... »

मोह

उड़ चलता है हर पक्षी घोंसला बनाने होते ही उम्मीदों का सवेरा श्याम को थक्कर ढूंढता फिरे अपना ही रैन बसेरा भटकती फिरे हर मधुमक्खी फूल फूल पत्ता पत्ता करके शहद इकट्ठा हजारों फूलों को छानती बार-बार पहुंचती देखने अपना छत्ता इंसान भी मोह का पुलिंदा हैमो परिवार की फिकर उसे सताती रहती है मुंह के बस में हर प्राणी सृष्टि सारी यही कहती है »

भौर

बाला घट भरने चल पड़ी भौर की लालिमा नभ मे बिखर पड़ी पगो से रोंदते हुए ओंस की बूँद बाला पनघट की ओर मुड़ चली. रस्सी खींचती सुकोमल हाथों से बिन कहे ही कहती बातें आँखों से हार गया तुम्हारी मनमोहनी चालो से सुंदरता का बखान कैसे करू मै तुछ बातों से. घट सर पर रख मंद- मंद मुस्काए नखरे करें और खूब इतराए कमरिया तेरी लचकती जाये अधजल गगरी छलकती जाये. देखता उसे मै रह गया गाँव की गलियों मे वो खो गई कुछ डग भरे उसकी ओ... »

मजदूरो के बच्चे

मेरे घर के सामने मजदूरो का जमावड़ा लगा था ईंटो का ढेर बड़ा था शायद कोई बंगला बन रहा था. कोई मजदूर ईंटे ढो रहा था कोई दीवार चिन रहा था हर मजदूर काम मे लगा था बच्चों की कोई परवाह नहीं कर रहा था. हम अपने बच्चों को धूल भी नहीं लगने देते है और मजदूरो के बच्चे देखो किस तरहा मिटटी मे लेटे है. मिटटी उड़ा उड़ा कर खेल रहे है मजदूरों के बच्चे सब अपने कर्मो का खाते ये कहते है हम वचन सच्चे गाढ़ा पसीना बहाया अपने पर... »

पथिक

जीवन की राह को नंगे पैर ही नापना पड़ता है मिटटी की गर्मी को छूकर ही भापना पड़ता है चलते चलते कभी रेत के टीले राह रोक लेते है मै डर जाऊ मै घबराऊ इसका ही तो मजा लोग लेते है राह मे कांटे आए जब रोता चलता रहा मै पथिक पर जीना छोड़ दू मन मे विचार ना आया तनिक. सारा मनोबल टूट गया मेरा जब राह मे एक बड़ा पत्थर आया उससे भी मै बच गया क्योंकि साथ था मेरे माँ-बाप का साया. एक मोड़ पे मुझे कुछ लोग मिले नेंन उनके ईर्ष्य... »

नशा

तू होनहार था तू सबसे होशियार था सबका तू गुरुर था अपनी प्यारी सी जिंदगी मे सपना तूने भी कोई देखा तो जरूर था झुक गया गमों के आगे दुनिया नाचे पैसे के आगे तब तो तू मजबूर था क्यों खोया लत मे ऐसा बहाया पानी की तरहा माँ-बाप का पैसा गुनाह करना भी तुझे मंजूर था तुझपे नशे का ऐसा भी क्या सरूर था छूटते जा रहे अपने तोड़े क्यों तूने अपनों के ही सपने ये करना क्या जरूर था तू इतना क्यों मजबूर था भागता रहा बस नशे के... »

आतिशबाजी

वो आतिशबाजी किस काम कि जो कानो को बहरा कर दे अगले ही दिन प्रदूषण से वातावरण को धुए से भर दे. मै तो चाहूँ ऐसी लड़ी जलाना कि जिंदगी फुलझड़ी जैसी जगमग हो चाहूँ ऐसा अनार जलाना जिसमे खुशियों कि फुहार पग पग हो. ऐसा फोड़ू मुस्कुराहटो का सुतली बम जो लोगो का दिल उत्साह से भर दे ऐसा जलाऊ उमंगो का रॉकिट जो आसमान रंगबिरगी खुशियों से भर दे. »

दीपावली का अगला दिन

हम अपने घरों का का कोना कोना चमकाते है ताकि अच्छे से मना सके दीपावली का दिन और कितना कूड़ा फैला देते है दीपावली के दिन ही दिन. छिड़कते है गंगाजल वातावरण स्वच्छ बनाने को ताकि घर पवित्र रहे दीपावली के दिन और इतने पटाखे फोड़ते है कि धुआँ धुआँ कर देते है दीपावली के अगले ही दिन. काम से छुट्टी करके मनाते है दीपावली का दिन तीन गुना गाड़ियां भगाते है सड़को पर दीपावली के अगले ही दिन. देश का सबसे बड़ा त्यौहार है ... »

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