जिसे देख देख कर मैंने पुरी ग़ज़ल लिख डाली,
वहीं रूबाई में औरों का नाम ढुंढता है।
मेरी हर रात गुजरी इंतजार में झरोखे पर,
वो है कि मिलने को कोई शाम ढुंढता है।
चांद की खुबसूरती उसके दाग में है,
वो दीवाना सबकुछ बेदाग ढुंढता है।
कुछ कहने सुनने का अब मौसम कहां रहा,
वो समझे ना समझे , मेरा दिल भी अब आराम ढुंढता है।
Ghazal
Comments
16 responses to “Ghazal”
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वाह बहुत खूब
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Thank you sir
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बहुत सुंदर रचना
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Thank you di
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Wah
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Thank you di
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waah wah
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Thank you sir
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Good
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Thank you sir
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Wah
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VERY NICE
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Thank you
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वाह बहुत सुंदर
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धन्यवाद
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Kaon
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