Ghazal

जिसे देख देख कर मैंने पुरी ग़ज़ल लिख डाली,
वहीं रूबाई में औरों का नाम ढुंढता है।
मेरी हर रात गुजरी इंतजार में झरोखे पर,
वो है कि मिलने को कोई शाम ढुंढता है।
चांद की खुबसूरती उसके दाग में है,
वो दीवाना सबकुछ बेदाग ढुंढता है।
कुछ कहने सुनने का अब मौसम कहां रहा,
वो समझे ना समझे , मेरा दिल भी अब आराम ढुंढता है।

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15 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - October 22, 2019, 1:12 pm

    वाह बहुत खूब

  2. NIMISHA SINGHAL - October 22, 2019, 3:01 pm

    बहुत सुंदर रचना

  3. Poonam singh - October 22, 2019, 3:03 pm

    Wah

  4. Shyam Kunvar Bharti - October 22, 2019, 4:19 pm

    waah wah

  5. nitu kandera - October 24, 2019, 8:17 am

    Wah

  6. Anil Kumar mishra - October 24, 2019, 4:28 pm

    VERY NICE

  7. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 25, 2019, 5:15 pm

    वाह बहुत सुंदर

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