तेरे असूल थे या फिर वो बदलते दौर थे .
मेरे लिए जो और थे गैरों के लिए जो और थे .
जिनको उठाने के लिए मिली मुझे सजा ए मौत ,
आज कहती हैं अदालतें मुद्दे वो काबिल ए गौर थे .
मेरे लिए ही थीं वो क्या मर्यादाओं की दुहाइयाँ ,
जिनके लिए हया छोड़ दी वो कौन से चितचोर थे .
कुछ भी कहो पर”राज़”यह अब हो रहा है आम यूँ ,
कोई दोष न इस तूफां का था घर गरीबों के कमजोर थे .
तेरे असूल थे या बदलते दौर थे
Comments
16 responses to “तेरे असूल थे या बदलते दौर थे”
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Bahut khub
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Sir मेरा सबसे पहला कमेंट आपके कमेंट का जवाब है .
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तह ए दिल से शुक्रिया श्रीमान जी ,इस प्लेर्फोर्म पर यह मेरी प्रथम रचना है और आपका कमेंट प्रथम कमेंट ,जो कि बहुत ही मूल्यवान है .
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बहुत सुन्दर
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तह ए दिल से शुक्रिया इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए.
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wah kya usool h
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एक ज़माने के बाद वाखिफ़ हुए हम जमाने के इस रिवाज से .
कि बदल लिए हैं लोग अपने असूल भी सहूलियत के हिसाब से .
तहए दिल से शुक्रिया आपका इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए .
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Wah
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उसका दिया ग़म ही आजकल तो बाचीत की वजह निकलती है .कि जब भो मेरी आह नकलती है उसकी जुबां से वाह निकलती है …तह ए दिल से शुक्रिया इस होंसला अफ़्ज़ाई के लिए .
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nice poetry
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Thanks a lot ji .
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Bahut achi kavita bhai
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दिल से आभार sir ji इस होंसला अफ़ज़ाई के लिए .
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क्या बात है कि
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दिल से आभार
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वाह, सुन्दर पंक्तियाँ
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