तू ममतामयी तू जगजननी रहे आँचल तेरा हरा-भरा l तू पालक है प्राणी मात्र की, हे जीवनदायनी वसुंधरा l यह रज जो तेरे दामन की, लगती है शीतल चंदन सी, तू उपासना की पाक ज्योति, […]

हर दौर में अधर्म का प्रारम्भ एक नव-चरण होता रहा l हर एक युग में “हे रावण” तेरा नव-अवतरण होता रहा l हर बार अग्नि परीक्षाओं से गुजरी सीता सती सी नरियाँ , किसी न […]