Raj Bhatia, Author at Saavan's Posts

तेरे असूल थे या बदलते दौर थे

तेरे असूल थे या फिर वो बदलते दौर थे . मेरे लिए जो और थे गैरों के लिए जो और थे . जिनको उठाने के लिए मिली मुझे सजा ए मौत , आज कहती हैं अदालतें मुद्दे वो काबिल ए गौर थे . मेरे लिए ही थीं वो क्या मर्यादाओं की दुहाइयाँ , जिनके लिए हया छोड़ दी वो कौन से चितचोर थे . कुछ भी कहो पर”राज़”यह अब हो रहा है आम यूँ , कोई दोष न इस तूफां का था घर गरीबों के कमजोर थे . »