Author: Rakesh Raj Bhatia

  • जीवनदायनी वसुंधरा

    तू ममतामयी तू जगजननी रहे आँचल तेरा हरा-भरा l
    तू पालक है प्राणी मात्र की, हे जीवनदायनी वसुंधरा l
    यह रज जो तेरे दामन की, लगती है शीतल चंदन सी,
    तू उपासना की पाक ज्योति, तू पावन आरती-वंदन सी ,
    तू माँ की ममता सी कोमल तू चाँद-सूरज सी मर्यादित,
    तू चेतना की अभिप्राय, कोटि जीवन तुझ पर आश्रित,
    तेरा ही ममता का ऋणी है इस सृष्टि का कतरा-कतरा l
    तू पालक है प्राणी मात्र की, हे जीवनदायनी वसुंधरा l

  • हे रावण

    हर दौर में अधर्म का प्रारम्भ एक नव-चरण होता रहा l
    हर एक युग में “हे रावण” तेरा नव-अवतरण होता रहा l
    हर बार अग्नि परीक्षाओं से गुजरी सीता सती सी नरियाँ ,
    किसी न किसी रूप में औरत का यूँ अपहरण होता रहा l आखों पर पट्टी बांधकर इन्साफ तो तख़्त पर बैठा रहा ,
    भरी सभा में किसी पंचाली का यूँ चीर-हरण होता रहा l
    हर दौर में भरोसा तोड़कर पीठ में हैं खँजर उतारे गए ,
    हर घर में कोई तो घर का भेदी वभीषण होता रहा l
    पाप कितना बलवान हो पर यह बात बिल्कुल सत्य है ,
    हर एक युग में राम से ही पराजित यह रावण होता रहा l

  • तेरे असूल थे या बदलते दौर थे

    तेरे असूल थे या फिर वो बदलते दौर थे .
    मेरे लिए जो और थे गैरों के लिए जो और थे .
    जिनको उठाने के लिए मिली मुझे सजा ए मौत ,
    आज कहती हैं अदालतें मुद्दे वो काबिल ए गौर थे .
    मेरे लिए ही थीं वो क्या मर्यादाओं की दुहाइयाँ ,
    जिनके लिए हया छोड़ दी वो कौन से चितचोर थे .
    कुछ भी कहो पर”राज़”यह अब हो रहा है आम यूँ ,
    कोई दोष न इस तूफां का था घर गरीबों के कमजोर थे .

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