खामोश एहसास

मन्ज़िल की तलाश में खुद राहों को आना पड़ा,
ख्वाबों की तलाश में जैसे आँखों को जाना पड़ा,

चाँद सूरज जब रौशनी कर न सके मेरे दिल में,
छोड़ कर घर अपना फिर जुगनुओं को आना पड़ा,

बहरी होने लगी जब हवाओं की बहर कहानी,
खामोश रहकर फिर एहसासों को सुनाना पड़ा,

रात दिन ढूढ़ता रहा मैं जिस लम्हें की आहट को,
एक साँझ अपने ही हाथों वो लम्हा छिपाना पड़ा,

दोस्ती इतनी गहरी रही अपने खुद के पायदान से,
के रिश्तों की म्यान से “राही” को बाहर लाना पड़ा।।

राही अंजाना
मीजान – संतुलन/तराजू

Comments

28 responses to “खामोश एहसास”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर

      1. Pragya Shukla

        Thnx

      1. वोट मी

      1. Pragya Shukla

        ओके

    1. Pragya Shukla

      Vote me

  2. Prince Wahid

    बहुत ख़ूब राही जी

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अच्छा लगता है

  4. दिनेश जोशी Avatar
    दिनेश जोशी

    बहुत सुन्दर

  5. Pawan Raajpoot Avatar
    Pawan Raajpoot

    वाह सर जी

  6. Utkarsh Dhalla Avatar
    Utkarsh Dhalla

    Nice

  7. Amit Kumar Avatar
    Amit Kumar

    Nice poem

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