मैं शिवांशी , जल की धार बन
शांत , निश्चल और धवल सी
शिव जटाओं से बह चली हूँ
अपने मार्ग खुद ढूँढती और बनाती
आत्मबल से भरपूर
खुद अपना ही साथ लिए
बह चली हूँ
कभी किसी कमंडल में
पूजन को ठहर गई हूँ
कभी नदिया बन किसी
सागर में विलय हो चली हूँ
जिस पात्र में रखा उसके
ही रूप में ढल गई हूँ
तुम सिर्फ मेरा मान बनाये
रखना, बस इतनी सी इच्छा लिए
तुम्हारे संग बह चली हूँ
मुझे हाथ में लेकर जो
वचन लिए तुमने
उन वचनों को झूठा होता देख,
आहत हो कर भी , अपने अंतर्मन
के कोलाहल को शांत कर बह चली हूँ
खुद को वरदान समझूँ या श्राप
मैं तुम्हारे दोषों को हरते और माफ़ करते
खुद मलीन हो बह चली हूँ
हूँ शिवप्रिया और लाडली अपने शिव की
उनकी ही तरह ये विषपान कर
फिर उन्हीं में मिल जाने के लिए
अपने कर्तव्यों का भान कर
निरंतर बह चली हूँ
अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास”
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