ज़िन्दगी के अँधेरे

कोई तकलीफ नहीं है हमको उजालों से
बस ज़िन्दगी के अँधेरे से डर लगता है

रोज़ ही रूठना रहता था तुम्हारा भी
बिछड़ने में गम ना होगा चलो अच्छा है

तुम भी कहां रहे हो तुम
हमें भी तो देखो ना अब हम भूल गए

मुबारक हो तुम्हें जुदाई के हसीं लम्हे
तुम्हें मुझसे दूर जाना ही अच्छा लगता है

अब मुहब्बत कहो या तुम्हारी रुसवाई
मेरा हर अंदाज़ अब शायराना लगता है

हर लम्हात जुड़ा है तेरी यादों से
भूलने से तुम्हें बहुत कुछ याद आता है

जब साँस थमेगी तो चैन आयेगा ‘प्रज्ञा’
अब तो जीना भी मुहाल लगता है

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